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मौलिक अधिकार क्या है,(What is Fundamental Rights)

मौलिक अधिकार क्या है ?(What is Fundamental Rights)

• वे अधिकार जो संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12-35 में वर्णित हैं ‘मौलिक अधिकार’ कहलाते हैं। संविधान के भाग-3 को भारत का मैग्नाकार्टा कहते है। भारत में मौलिक अधिकार, अमेरिकी संविधान की प्रेरणा है।

● यह अधिकार सभी नागरिकों के शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक विकास को पूर्णरूपेण सुनिश्चित करते हैं। वे उन सभी आधारभूत स्वतन्त्रताओं तथा शर्तों को समाहित करते हैं जो एक उचित रहन-सहन के लिए आवश्यक हैं। fundamental right देश में अल्पसंख्यकों के बीच में एक सुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। वे बहुसंख्यकों के शासन के लिए ‘लोकतांत्रिक वैधता’ की रूपरेखा प्रतिस्थापित करते हैं। आधारभूत अधिकार, जैसे भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बिना कोई लोकतंत्र कार्य नहीं कर सकता। मौलिक अधिकार आचरण, नागरिकता, न्याय एवं निष्पक्ष क्रियाकलाप के मानक प्रदान करते हैं। यह सरकार की जाँच के रूप में कार्य करते हैं। देश की विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनैतिक समस्याएं मौलिक अधिकारों को और महत्वपूर्ण बनाती

मौलिक अधिकारों का विकास (Development of Fundamental Rights)

 

● भारत में  की मांग सर्वप्रथम संविधान विधेयक 1895 ई.के माध्यम से की गयी थी। भारतीयों को मौलिक अधिकार प्रदान करने की मांग 1917 1919 ई. के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा किया गया।

⇒1925 ई. श्रीमती ऐनी बेसेंट द्वारा कामनवेल्थ ऑफ इण्डिया बिल(Common Wealth of India Bill) माध्यम से तथा 1928 ई. में मोती लाल | नेहरू द्वारा नेहरू रिपोर्ट के माध्यम से की गई।

⇒1927 ई. में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन तथा 1931 के करांची । अधिवेशन (अध्यक्ष सरदार बल्लभ भाई पटेल) में कांग्रेस ने मूल अधिकारों की मांग की थी।

⇒दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान 1931 ई. में महात्मा गांधी भी यह मांग उठायी गई थी, किन्तु 1934 ई. में सरकार की संयुक्त संसदीय समिति ने इसे अस्वीकार कर दिया। अत: 1935 ई. के भारत शासन अधिनियम में इसे शामिल नही किया गया।

⇒1945 ई. में तेज बहादूर सप्रू ने भी संविधान के सम्बन्ध में प्रस्तुत रिपोर्ट में भारतीयों को fundamental right  दिये जाने की वकालत किये थे। संविधान निर्माण के समय संविधान सभा द्वारा मूल अधिकार तथा अल्पसंख्यक अधिकार के | सम्बन्ध में परामर्श के लिए वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में एक परामर्श । समिति का गठन किया था। मूल अधिकार पर परामर्श हेतु एक उपसमिति का | गठन भी जे. बी. कृपलानी की अध्यक्षता में किया गया था। इसकी सिफारिश के । आधार पर भारतीय संविधान के भाग-3 में मौलिक अधिकार का प्रावधान किया गया।

● fundamental right भारतीय संविधान द्वारा परिभाषित नही किया गया है। ब्रिटेन के संविधान में बिल आफ राइटस (अधिकार पत्र) को मूल अधिकार कहा जाता है। फ्रांस एवं अमेरिका में इन अधिकारों को प्राकृतिक और अप्रतिदेय अधिकारों के रूप में स्वीकार किया गया है। भारत में मौलिक अधिकार भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त विशेष अधिकार है। इसमें उन आधारभूत अधिकारों का समावेश किया गया है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए नितान्त आवश्यक । है। इस प्रकार मौलिक अधिकार वे अधिकार होते है जो व्यक्ति के जीवन के लिए | मूलभूत तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये | गये है। सामान्यतया व्यक्ति के इन अधिकारों में राज्य के द्वारा भी हस्तक्षेप नही | किया जा सकता।

● सामान्यतया  fundamental rightराज्य के विरूद्ध नागरिको को प्रदान किया गया है। किन्तु कुछ मौलिक अधिकार व्यक्तियों के विरूद्ध भी प्रदान किया गया है। अनुच्छेद-15 (2) अनुच्छेद 17, अनुच्छेद 23 और अनुच्छेद 24 के अन्तर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकार व्यक्तियों के विरूद्ध है।

● संविधान द्वारा कुछ मूल अधिकार केवल नागरिकों को (जैसे अनुच्छेद-15, 16, 19, 29 तथा 30 द्वारा प्रदत्त मूलाधिकार) प्रदान किया गया है तो कुछ | मौलिक अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए है। आपातकाल की स्थिति में राष्ट्रपति, | अनुच्छेद 20 तथा अनुच्छेद 21 के सिवाय, अन्य सभी मौलिक अधिकारो को | निलम्बित कर सकता है।

• अनुच्छेद-359 भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार की प्रकृति सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनो है। नागरिको को प्रदत्त स्वतंत्रताएं जैसे, अनुच्छेद 19 व 25-28 सकारात्मक प्रकृति के मौलिक अधिकार है। नकारात्मक मौलिक अधिकार राज्य की शक्ति पर निबन्धन के रूप में है।

(जैसे अनु 14,15,16,21 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार) ।

● मौलिक अधिकार न्याय योग्य है, अत: इसे न्यायालय द्वारा प्रवर्तित (लागू) कराया जा सकता है। इसमें संसद साधारण विधि द्वारा किसी भी प्रकार से कभी नही कर सकती है। मौलिक अधिकार का अधित्यजन नही किया जा सकता है।

मौलिक अधिकार से सम्बंधित सिद्धान्त

1. पृथक्करणीयता का सिद्धान्त (Doctrine of severability)

● यदि किसी अधिनियम का कोई भाग असंवैधानिक होता है तो प्रश्न उठता है कि क्या उस पूरे अधिनियम को ही शून्य घोषित कर दिया जाए या केवल उसके उसी भाग को अवैध घोषित किया जाए जो संविधान के उपबंधों से असंगत है? उच्चतम न्यायालय ने पृथक्करणीयता का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए कहा है कि यह किसी अधिनियम का अवैध भाग उसके शेष भाग से बिना विधानमण्डल के आशय अर्थात अधिनियम के मूल उद्देश्य को समाप्त किए बिना अलग किया जा सकता है। केवल मौलिक अधिकारों से असंगत वाला भाग ही अवैध घोषित किया जाएगा, पूरे अधिनियम को नहीं।

2. आच्छादन का सिद्धान्त (Doctrine of Eclipse)

● आच्छादन का सिद्धान्त अनुच्छेद-13 के उपखण्ड (1) पर आधारित है। अनुच्छेद-13 (1) के अनुसार संविधान पूर्व विधियों संविधान लागू होने पर | उस मात्रा तक अवैध होगी जिस तक वे मौलिक अधिकारों से असंगत है। ऐसी |विधियां प्रारम्भ से ही शून्य नहीं होती, बल्कि अधिकारों के प्रवर्तित हो जाने के कारण वे मृतप्राय हो जाती है और उसका प्रवर्तन नहीं किया जा सकता, वे केवल मौलिक अधिकारों द्वारा आछादित हो जाते है और सुषुप्तावस्था में रहते है।

3. अधित्याग का सिद्धान्त (Doctrine of Waiver) )

● कोई भी व्यक्ति संविधान प्रदत्त अधिकारों को स्वेच्छा से त्याग नहीं सकता है। मौलिक अधिकार केवल व्यक्तिगत हित के लिए नहीं वरन लोकनीति के आधार पर जनसाधारण के हित के लिए संविधान में समाविष्ट किए गए है। अतः अधित्याग का सिद्धान्त उन अधिकारों पर नहीं लागू होता है।

4. भूतलक्षी नहीं(Not Retrospective)

अनुच्छेद-13 का प्रभाव भूतलक्षी नहीं है। संविधान पूर्व विधियों प्रारम्भ से ही अवैध नहीं होती। मौलिक अधिकारों से असंगत संविधान पूर्व विधियों संविधान लागू होने के पश्चात ही अवैध होंगी। यदि किसी व्यक्ति ने संविधान लागू होने के पहले को ऐसा काम किया है जो उस समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुसार अपराध था, तो वही संविधान लागू होने पर यह नहीं कह सकता कि उसे अपराध के लिए दण्ड नही दिया जाना चाहिए, क्योकि संविधान ऐसे दण्ड को वर्जित करता है। संक्षेप में, मौलिक अधिकार प्रभाव भूतलक्षी नहीं है बल्कि इसका भावी प्रभाव है।

5. दोहरी जोखिम का सिद्धान्त (Doctrine of Double jeopardy)

अनुच्छेद-20 के खण्ड (2) में दोहरी जोखिम का सिद्धान्त समाविष्ट है, क्योंकि इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जाएगा। यह किसी व्यक्ति को उन कार्यवाहियों से उन्मुक्ति प्रदान नहीं करता जो न्यायालय के समक्ष नही है अतः न्यायालय द्वारा अभियोजित और दोष सिद्ध सरकारी कर्मचारी को उसी अपराध के लिए विभागीय कार्यवाही के अन्तर्गत भी दण्डित किया जा सकता है। इस प्रकार विभागीय रूप से दण्डित व्यक्ति पर न्यायालय में अभियोग चलाया जा सकता है।

 

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